GIS, Remote Sensing System and Process of Spatial Planning

Dr. K. S. Gurupanch

Principal, M.J. College, Kohka, Bhilai (C.G.)

*Corresponding Author E-mail: kubergurupanch@gmail.com

 

ABSTRACT:

A minimum delineation unit of 5 mm x 5 mm was used for mapping. Data was then digitized using ILWIS, the by creating a digital database for further analysis. Subsequently land use maps were crossed with each other to identify and quantify the land use changes types. Finally, hot links and User Interface was developed so that the information can be provided to the user with a well-documented procedure. The system in this case will be operated from Arc / View environment. Development of policies, plans, projects or interventions are among the very important decisions in resource management. Planning should consider a variety of complex social, ecological, economic and cultural processes, and this requires proper tools, methods and procedures that integrate major processes in a planning support system. Land uses changes have been detected by image processing method in EDRAS imagine. Finally to predict the changes in urban habitants and land use/land cover changes occurred. Monitoring of land use/land cover changes which would help to plan development activities such as major schemes and for used requirements. Change detection has shown that the built up area increased between 1990 and 2005 by 15.83% from 6513.29 ha to 9300.97 ha. Also, the area with irrigated land farms have been decreased to 436.99 ha (2.48%) and the scrub land decreased to 5.19%.

 

KEYWORDS: Land use/land cover, Change detection.

 

 


प्रस्तावना

ज्योग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम विशेषज्ञ के रूप में इस क्षेत्र में रोजगार की बहुत चमकीली संभावनाएं बन रही हैं। ज्योग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम के माध्यम से पृथ्वी की भौगोलिक आकृतियों, भू-भागों आदि को डिजिटल रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह एक हाईटेक तकनीक है, जिसमें किसी भी डाटा को एनालॉग से डिजिटल तकनीक में बदला जाता है। ज्योग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम से प्राप्त मानचित्रों को हाईटेक मानचित्र कहा जाता है । ये मानचित्र न केवल तकनीकी रूप से बहुत उन्नत होते हैं बल्कि उनसे भौगोलिक दृश्यों को सरलता से प्रदर्शित भी किया जा सकता है।1 दूसरी भाषा में ज्योग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम को रिमोट सेंसिंग तकनीक का समरूप भी कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें किसी भी स्थान की स्थिति को उस स्थान पर जाए बिना ही अपने कंप्यूटर पर देखा एवं बनाया जा सकता है।

 

पर्यावरणीय और भौगोलिक दृष्टि से बहुत ही अहम मानी जाने वाली यह तकनीक पश्चिमी देशों में तो बहुत उन्नत अवस्था में है ही, अपितु भारत में भी यह बहुत तेजी से विकास कर रही है।

 

भूगोलीय निर्देशांक प्रणाली को मुख्यतः तीन तरीकों से देखा जा सकता है -

 

1.   डेटाबेस: यह डेटाबेस संसार का अनन्य तरीके का डेटाबेस होता है। एक तरह से यह भूज्ञान की सूचना प्रणाली होती है। बुनियादी तौर पर जी॰ आई॰ एस॰ प्रणाली मुख्यतः संरचनात्मक डाटाबेस पर आधारित होती है, जो कि विश्व के बारे में भौगोलिक सूचकों के आधार पर बताती है।

 

2.   मानचित्र: यह ऐसे मानचित्रों का समूह होता है, जो पृथ्वी की सतह संबंधी बातें विस्तार से बताते हंै। यह डेटाबेस के लिये इंटरफेस का कार्य भी करते हैं और इनके जरिये स्थानिक पृच्छा (ेचंजपंस ुनमतल) की जा सकती है।

 

3.   प्रतिरूप: यह सूचना परिवर्तन उपकरणों का समूह होता है, जिसके माध्यम से वर्तमान डाटाबेस द्वारा नया डाटाबेस बनाया जाता है।2

 

भौगोलिक सूचना तंत्र

भौगोलिक सूचना तंत्र से संबन्धित विविध साॅफ्टवेयरों की सूची है। ये सॉफ्टवेयर भांति-भांति के होते हैं किन्तु सबमें आंकिक मानचित्र (डिजिटल मैप) एवं भौगोलिक निर्देशांक का मिश्रण होता है-

 

तालिका

सॉफ्टवेयर    लाइसेंस      कंपनी भाषा

डंचपदवि     ैींतमूंतम ॅपदकवूे    अंग्रेजी में

।तबळप्ै     ैींतमूंतम ॅपदकवूे    अंग्रेजी में

ळम्व्डम्क्प्।   थ्तममूंतम    ॅपदकवूे    अंग्रेजी में

ळत्।ैै      ळछन् डनसजपचसंजंवितउं  अंग्रेजी में

हअैप्ळ ळछन् ळच्स्  डनसजपचसंजंवितउं  म्ेचंदीवसम स्द्ददहनं बीपदमेंद्यब्ीपदट्टे

डंचॅपदकवू    डच्स्  ॅपदकवूे    अंग्रेजी म

फनंदजनउ ळप्ै     ळच्स्  डनसजपचसंजंवितउं  अंग्रेजी में

ैच्त्प्छळ     थ्तममूंतम    डनसजपचसंजंवितउं  पुर्तगाली व अंग्रेजी में

पैउंतज ैींतमूंतम डनसजपचसंजंवितउं  अंग्रेजी में

ज्मततंटपमू   ळछन् ळच्स्  डनसजपचसंजंवितउं  अंग्रेजी में

स्त्रोत:- ीजजचरूध्ध्ीपण्ूपापचमकपंण्वतहध्ेध्35

 

 

पृथ्वी अवलोकन प्रणाली

भारतीय पृथ्वी अवलोकन गतिविधियां, जो राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली (छछत्डै) के संस्थागत ढांचे में योजना आयोग के क्रियाकलापों के तत्वाधान में क्रियान्वित हो रही हैं, अपने अनुप्रयोग  के संचालित दृष्टिकोण के लिए व्यापक रूप से दुनिया भर में प्रशंसित हैं।3 भारतीय रिमोट सेंसिंग (प्त्ै) उपग्रहों और इनसैट (प्छै।ज्) प्रणाली के विषयगत श्रृंखला में अंतरिक्ष उपकरणों के समूह के साथ, भारतीय पृथ्वी अवलोकन प्रणाली देश में उपयोगकर्ता समुदाय के लिए विविध प्रकार की परिचालन सेवाएं प्रदान करती हैं। इनमें भूमि और जल संसाधनों के प्रबंधन, कार्टोग्राफिक और बड़े पैमाने पर मानचित्रण अनुप्रयोगों के लिए उपग्रहों की विषयगत श्रृंखला और समुद्र तथा वायुमंडलीय अनुसंधान क्षेत्रों में परिचालन सेवाओं की आवश्यक निरंतरता प्रदान करने के दृष्टिकोण से योजना बनाई गई है।

 

छछत्डै की योजना समिति (च्ब्-छछत्डै)

ये कार्यक्रम का सर्वत्र निरीक्षण करती है और कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करती है। छछत्डै के अधीन गठित नौ स्थायी उच्च अधिकार संपन्न समितियां:-

 

1.   कृषि और मिट्टी

2.   जैव संसाधन और पर्यावरण

3.   भूविज्ञान एवं खनिज संसाधन

4.   जल संसाधन

5.   महासागर और मौसम विज्ञान

6.   प्रतिचित्रण और मानचित्रण

7.   शहरी प्रबंधन

8.   ग्रामीण विकास

9.   प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी

 

 

विभिन्न विषयगत क्षेत्रों में सुदूर संवेदन के अनुप्रयोगों से संबंधित विशिष्ट मुद्दों का समाधान करती हैं।

 

पृथ्वी अवलोकन उपग्रह

भारतीय रिमोट सेंसिंग (प्त्ै) उपग्रह प्रणाली आज विश्व का सबसे बड़ा कार्यवाही दूरसंवेदी उपग्रहों का समूह है। वर्तमान में दस क्रियाशील उपग्रह अपनी कक्षा में हैं -

1.  रिसोर्ससैट - 2

2.  कार्टोसैट - 2

3.  ओशनसैट - 2

4.  रीसैट - 2

5.  कार्टोसैट - 2

6.  आईएमएस - 1

7.  कार्टोसैट - 2

8.  कार्टोसैट - 1

9.  रिसोर्ससैट - 1

10. टीईएस

 

प्त्ै श्रृंखला के उपग्रह विविध प्रकार के स्थानिक, वर्णक्रमीय और सामयिक विभेदन में डेटा उपलब्ध कराते हैं।4 ये और आने वाले दिनों में रीसैट-1, मेघा-ट्रोपिक्स, ै।त्।स्, कार्टोसैट-3 और इनसैट -3 डी जैसे नियोजित उपग्रहों की विषयगत श्रृंखला के साथ, भारतीय म्व् द्वारा मानचित्रण से लेकर जलवायु तक फैले कई क्षेत्रों में अनुप्रयोगों को सक्षम करने के लिए उत्पाद और सेवाएं जारी रखना अपेक्षित है ।

 

जी. आई. एस. ईमेज प्रोसेंसिंग प्रभाग

जी. आई. एस. इमेज प्रोसेसिंग प्रभाग द्वारा उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों से कम्प्यूटरीकृत विश्लेषण एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली से संबंधित कार्यक्रमों का क्रियान्वयन किया जाता है। इसी प्रभाग द्वारा राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन सूचना प्रणाली के अंतर्गत तैयार आंकड़ों के रख रखाव एवं अन्य परियोजनाओं हेतु आंकड़ें उपलब्ध कराने का कार्य किया जाता है।5 विगत वर्षों में सुदूर संवेदन तकनीक एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली के माध्यम से परिषद के सुदूर संवेदन उपयोग केन्द्र द्वारा विभिन्न परियोजनाओं में महत्वपूर्ण स्थानिक जानकारी तैयार की गई है। इन जानकारियों को विभिन्न शासकीय संस्थाओं जैसे राज्य, जिला एवं कार्यपालिकाओं द्वारा उपयोग में लाये जाने को सुनिश्चित करने के उदेश्य से वर्ष 2008-09 में मध्यप्रदेश में राज्य स्थानिक डाटाबेस इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकाश का कार्य प्रारंभ किया गया।

 

निष्कर्ष:

ग्राम स्तर के नियोजन के लिए जिला भूमि अभिलेख विभाग के भूमि-कर मानचित्रों और भूमि उपयोग आंकड़ों का उपयोग किया जाता रहा है, परंतु इन आंकड़ों की उपलब्धता में और सुधार लाने और भूमि उपयोग के वास्तविक क्षेत्रीय विस्तार के सही और शुध्द आंकलन के लिए नई तकनीकों रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जी० आई० एस०) बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।6 भूमि-कर मानचित्र को अद्यतन करने में भी यह तकनीक बहुत ही उपयोगी साबित हो रही है। अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि भूमि अभिलेख विभाग के आंकड़ों और रिमोट सेंसिंग आकड़ों में लगभग 8 प्रतिशत क्षेत्रफल का अन्तर पाया गया है। वास्तविक क्षेत्रीय विस्तार वर्तमान समय में मात्र रिमोट सेंसिंग और जी०आई०एस० तकनीक द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। आंकड़ों के संग्रहण में क्षेत्र का व्यक्तिगत सर्वेक्षण भी आवश्यक होता है, क्योंकि रिमोट सेंसिंग इमेजरी में कुछ सूचनाओं के बारे में कभी-कभी भ्रम होता ह,ै जिसका निस्तारण क्षेत्र का सर्वेक्षण करके ही किया जा सकता है। सर्वेक्षण के दौरान भूमि के उपयोग तथा रबी और खरीफ मौसम के फसल प्रतिरूप का भी आंकड़ा इकट्ठा किया जाना चाहिए। आधार फसलों के साथ ही साथ साहचर्य या पूरक फसलों के उत्पादन को बढाने के लिए आधारभूत सुविधाओं की व्यवस्था भी अच्छी करनी चाहिए।

 

संदर्भ:

1ण् चटर्जी, एस.पी., 1954, लैंड यूटीलाइजशन सर्वे आॅफ हावड़ा डिस्ट्रिक्ट, ज्याॅग्राफिकल रिव्यू आॅफ इंडिया, वोलुम 1, (3)

2ण् जोगाी, वीना यु., और विकास नागर, 2010, टेम्पोरल चेन्जेज इन द लैंड-यूज/लैंड-कवर फार द लास्ट वन डिकेड ,लोंग पारवारा बेसिन, वोलुम  32, न० 2, पेज 183-192.

3ण् तिवारी, आर.सी., सिंह, बी.,न., 2000, कृषि भगोल, प्रयाग पुस्तक भवन, इलाहाबाद, पेज 84-85 और 124-125

4ण् नूतन त्यागी, 2004, स्पैसियल डिस्ट्रीब्यशन आॅफ लैंड -यूज/लैंड - कवर आॅफ एन अर्बन एरिया यूजिंग रिमोट सेंसिग एण्ड ज्याॅग्राफिकल इनफारमेसन्स सिस्टम वोलुम ग्ग्ग्प्ग्, न० 12, पेज 41-50

5ण् पृध्वी राजू, के.,न., 1992, रिमोट सेंसिग: स्टैटस इन इंडियन ज्याॅग्राफि, नेशनल ज्याॅग्राफिकल जर्नल आॅफ इंडिया, वोलुम 38, पार्ट प् जव प्ट, पेज 195-204.

6ण् पाण्डेय, आर. एस., 2012, रिमोट सेंसिंग, ग्लोबल पोजीशनिंब सिस्टम तथा भौगोलिक सूचना तंत्र, प्रतिबिम्ब, राष्ट्रीय एटलस एवं थिमैटिक मानचित्र संगठन, अंक-13, पेज 10-16

 

 

Received on 12.11.2014       Modified on 25.11.2014

Accepted on 15.12.2014      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(4): Oct. - Dec. 2014; Page 205-207